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नदी के बीचों-बीच खड़े न्यूज़रुम की असली चुनौती

रॉयटर्स की ताज़ा रिपोर्ट, जो अब पुरानी (बासी) जान पड़ती है, मौसम का हाल तो बताती है लेकिन तूफ़ान से बाहर कैसे निकलना है, यह हम पर छोड़ देती है। बतौर पत्रकार हमें एक ऐसी पहेली सुलझानी है जिसका कोई सिरा फिलहाल हाथ आता नहीं दिखता। इस रिपोर्ट को निराशावादी अथवा आशावादी, किसी भी नज़रिए से पढ़ा जा सकता है; हालाँकि 'अवसरवादी' नज़रिया अपनाना बेहतर होगा। इसमें जिस 'बारबेल प्रभाव' (Barbell Effect) का ज़िक्र है, वह कुछ वैसा ही है जैसे कोई हमसे कहे कि नदी के दो किनारों में से एक को चुन लो और फिर उसी तरफ रहो। विडंबना यह है कि वर्तमान में आप नदी के बीचों-बीच हैं और आपके साथी पूछ रहे हैं कि किस तरफ चलना है। न्यूज़रूम में संचालन के साथ रणनीतिक भूमिकाएं निभाने वाले लोग निश्चित रूप से इस दुविधा से गुज़र रहे होंगे। नदी के एक किनारे पर मानवीय विशिष्टता पर केंद्रित पत्रकारिता है, तो दूसरे किनारे पर वह पत्रकारिता है जो कम लागत पर 'स्केल' और 'दक्षता' के लिए AI का इस्तेमाल करती है। पहली शैली ज़मीनी स्तर पर ओरिजिनल रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण, मानव-केंद्रित कहानियों और कम्युनिटी बिल्डि...
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पुलवामा टेरर अटैक: आतंकवाद के ख‍िलाफ साथ का सच!

राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह लाइनें 'क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।'  आज की जियो पॉलिटिक्‍स पर फि‍ट बैठती हैं। पुलवामा टेरर अटैक के बाद दुनिया भर के नेताओं ने संवेदना जताई है। आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खड़े होने का भरोसा दिलाया है। बहरहाल जब सच के आइने में देखते हैं तो तस्‍वीर उलट नजर आती है। इधर अफगानिस्‍तान से बाहर निकलने को बेचैन अमरीका तालिबान से बात कर रहा है। जो पाकिस्‍तान अफगान समस्‍या की जड़ में है वही इसका ताना-बाना बुन रहा है। इस बातचीत में अफगानिस्‍तान की चुनी हुई सरकार की कोई भूमिका नहीं है। सौदेबाजी जिसे अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर नेगोशियेशन कहकर पुकारा जाता है कतर की राजधानी दोहा में हो रही है। यहां सऊदी अरब की भूमिका पर भी गौर करना जरूरी है जिसकी कतर के साथ इस समय ठनी हुई है। कतर में अमरीकी सैनिक अड्डा है वहीं सऊदी अरब मिडिल ईस्‍ट में अमरीका का सबसे करीबी साझीदार है जिसके लिए डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरान से न्‍यूक्‍ल‍ियर डील तोड़ने में वक्‍त नहीं लगाया। सऊदी अरब और पाकिस्‍तान में हमेशा से करीब ...

कभी कोई अयोध्‍या की भी सुनेगा

अयोध्‍या पर बोलने वाले बहुत हैं लेकिन उससे पूछने वाले कम हैं। वह लोगों की भीड़ को आते-जाते देखती रहती है, जब आवाजें शोर बन जाती हैं तब भी। जब वह सुर्खियों में नहीं होती, उसकी गलियों में खामोशी होती है। कभी-कभार उनकी खामोशी भी सुर्खियां बन जाती है। सन्‍नाटा जिसे देखकर लगेगा कि जैसे वनवास के बाद राम के लौटने का इंतजार है। सुबह सवेरे सरयू के जल में डुबकी लगाकर सिर बाहर निकालता श्रद्धालु या हनुमान गढ़ी पर हाथ से प्रसाद छीनकर भागता बंदर उसकी एक नहीं अनेक छवियां हैं। हमारी पीढ़ी का बड़ा हिस्‍सा टेलीविजन स्‍क्रीन पर सिर्फ एक ही देखता आया है। छवि जिसमें वह बंधा हुआ महसूस करने लगी है, जिसे तोड़कर बाहर आने का उसे रास्‍ता नहीं मिल रहा है। अयोध्‍या राम की है लेकिन राम सिर्फ अयोध्‍या के नहीं हो सकते। यही सोचकर शायद वह आने देती है हुजूम के हुजूम, जिनके आने से सन्‍नाटा टूटता रहता है। लोगों की भीड़ देख वह कभी उत्‍साह से भरती रही है, अब आशंका से भर जाती है। उसके अंदर सवाल जन्‍म लेने लगते हैं। हर बार उसके अंदर उम्‍मीद भी जगती है कि शायद कोई उसके सवालों का जवाब देता जाएगा और यह सिलसिला थम जाएगा। ऐस...

लोग जिनके लिए न तो मोमबत्तियां जली, न ही प्राइम टाइम डिबेट का मुद्दा बने

गांधी जयंती पर कर्तव्‍य की इतिश्री  गांधी जयंती पर बापू की प्रतिमा पर फूल-माला चढ़ाकर हमने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली। हम में से कई ने यह टीवी पर रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी', रजत कपूर की 'द मेकिंग ऑफ द महात्‍मा' या संजय दत्‍त की 'लगे रहो मुन्‍नाभाई' देखकर पूरा किया। जो यह नहीं कर सके उन्‍होंने फेसबुक, ट्विटर व वॉट्सएप पर महात्‍मा गांधी को याद किया। कई ने स्‍वच्‍छ भारत अभियान के बहाने ही सही झाड़ू के साथ सेल्‍फी ही ले ली। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से परेशान लोगों से इससे अधिक की उम्‍मीद करना भी बेमानी है। वैसे भी जिनके विचारों से दूरी बनानी होती है हम उनकी मूर्तियां लगा देते हैं। उन्‍हें भगवान बना देते हैं। मौका पड़ने पर यह कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं कि 'हम इंसान हैं' । न तो मोमबत्‍ती जली न प्राइम डिबेट का मुद्दा बने  सड़क पर खुले पड़े मैनहोल के बगल से बचकर निकलते हमें इस 'इंसानियत' का ख्‍याल नहीं ही आता है। उन चेहरों की भी याद नहीं आती जिन्‍हें अकसर हम बिना किसी सुरक्षा उपकरण नंगे बदन सीवर साफ करने के लिए उनके भीतर उतरते देखते हैं। हमें तब गा...

डीएमके कार्यालय में कविता सुनाते करुणानिधि

जीत की पटकथा मई का महीना रहा होगा, तारीख ठीक से याद नहीं। साल 2006, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम अभी आए ही थे। यह तय चुका था कि जयललिता की सरकार जा रही है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) सहयोगी दलों के साथ सत्‍ता में वापसी करने में कामयाब रही थी। इस जीत की पटकथा असल जिंदगी में स्क्रिप्‍ट राइटर व राजनेता एम करुणानिधि ने लिखी थी। 82 साल की उम्र में वह पार्टी को सत्‍ता में वापस लाने में सफल रहे थे। पांच साल पहले ही राज्‍य की जनता ने उन्‍हें टीवी स्‍क्रीन पर धकियाए व गिरफ्तार कर जेल ले जाए जाते देखा था। यह घटना 2001 में जयललिता की सत्‍ता में वापसी के ठीक बाद की है। जिसकी छवियां अभी धुंधली नहीं पड़ी थी। जिन लोगों ने तमिलनाडु की राजनीति को करीब से देखा है उनके लिए इस उक्‍त‍ि पर यकीन करना मुश्‍क‍िल हो सकता है कि राजनीति में कोई स्‍थाई शत्रु या मित्र नहीं होता। द्रविड़ राजनीति के दो ध्रुव इंडिया टुडे तमिल की संपादक रही वासंती ने अपनी किताब 'कटआउट, कास्‍ट एंड पॉलिटिक्‍स' में 1989 में एम करुणानिधि के कार्यकाल में तमिलनाडु विधानसभा के भीतर जयललिता की साड़ी खींचे जाने की घटना ...

भारतीय लोकतंत्र के लिए कर्नाटक के सवाल

भारत के दक्षि‍ण में विंध्‍य के पार कर्नाटक में जारी सियासी महाभारत के कई अध्‍याय लिखे जा चुके हैं। कई अभी लिखे जाने बाकी भी होंगे। किन्‍हीं के लिए यह ‘कर्नाटक का नाटक’ है। वैसे कन्‍नड़ के जिन दो शब्‍दों कर्ण व नाडु से मिलकर कर्नाटक बना है उसका मतलब होता है ऊंची भूमि। इस भूमि पर नया इतिहास लिखा नहीं दोहराया भर गया है। अतीत में भारतीय जनतंत्र ने न जाने कितनी बार ऐसा होते देखा है। राजनीति में राज जब राजनीति में से राज को रख लिया व नीति को भुला दिया जाता है। तब ऐसी ही तस्‍वीर सामने आती है। जनता बार-बार आईना दिखाती है लेकिन उसे देखना कोई नहीं चाहता। कर्नाटक ने चुनाव परिणाम आने से लेकर बीएस येदियुरप्‍पा सरकार के इस्‍तीफे तक भारतीय लोकतंत्र के लिए ढेरों सवाल छोड़ दिए हैं। जिनका जवाब आज नहीं तो कल तलाशना ही होगा। अगर जनप्रतिनिधियों के लिए सत्‍ता महज अवसर है तो वह जनता का सेवक होने का राग अलापना छोड़ ही दें तो बेहतर होगा। किसका डर यह पूछा जाना चाहिए कि किसके डर से कर्नाटक के विधायक होटल व रिजॉर्ट में बंधक बने रहे। किसी भी लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को जनता का डर होना चाहिए। जनत...

सब कुछ तर्क की कसौटी पर खरा नहीं होता

'अगर टमाटर खरबूजा होना चाहे, तो वे दिखने में कितने बेहूदा लगेंगे'। जापानी कवि मित्‍सुओ आइदा की यह लाइन हम में से न जाने कितनों पर फिट बैठेगी। वैसे कहा जाता है कि उन्‍हें इंसानी फितरत की गहरी समझ थी। उनकी इसी समझ पर अमरीकी अर्थशास्‍त्री रिचर्ड थेलर की टिप्‍पणी थी कि वे बिहेवेरियल इकोनॉमिस्‍ट रहे होंगे। गौरतलब है कि इस साल बिहेवेरियल इकोनॉमिक्‍स में अपने काम के लिए अर्थशास्‍त्र का नोबेल पुरस्‍कार रिचर्ड थेलर को ही मिला है। वैसे सोचने भर से कोई टमाटर खरबूजा होने से तो रहा। फिर भी अगर ऐसा हुआ तो...छोड़िए भी आप कहां अटक गए, आगे बढ़ते हैं। हम में से हर कोई हर रोज न जाने कितने फैसले ले रहा होता है। बच्‍चे का एडमिशन किस स्‍कूल में होगा से लेकर बेड पर किस रंग की चादर बिछेगी तक। घर के लिए परदे फ्लिपकार्ट से खरीदें या अमेजन से या पेटीएम कर लें। वैसे दुकान तक चलकर जाना कैसा रहेगा। बड़ी मुश्‍किल है। इसी डिसीजन मेकिंग को समझने के लिए थेलर इकोनॉमिक्‍स व साइकोलॉजी को करीब ले आए व खुद भी उनसे दोस्‍ती गांठ ली। इधर वह इंसानी बिहेवियर समझते रहे उधर बनी बनाई धारणाओं की खाट खड़ी हो गई। थेल...