पत्रकार और संपादक दुविधा में हैं। होना भी चाहिए, क्योंकि न्यूज़रूम बदल रहा है। हमारे बदलने या न बदलने से यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस दौर में पदनाम बदलें या न बदलें, भूमिकाएं अवश्य बदलेंगी। वैसे भी दुविधा कभी सुविधाजनक नहीं होती; यह अपने साथ भ्रांति, असमंजस और संशय लेकर आती है। अतीत के पन्ने पलटने पर आगे का रास्ता ज़्यादा साफ़ नज़र आता है। एक दौर था जब न्यूज़रूम का मतलब 'प्रिंट' हुआ करता था। डेस्क पर कॉपी लिखना, टाइपिंग, अनुवाद, प्रूफ-रीडिंग और पेज-मेकिंग जैसे काम अलग-अलग लोग किया करते थे। उप-संपादक की भूमिका किसी पन्ने के लिए एक निर्देशक सरीखी थी। समय बदला, तकनीक बेहतर हुई और अब उप-संपादक या उसके समकक्ष पेशेवर अकेले ही कमोबेश ये सारे दायित्व निभाते हैं। भारतीय भाषाओं के मामले में AI का हाथ अभी थोड़ा तंग है, लेकिन वह अनुवाद कर लेता है और व्याकरण की गलतियां सुधार लेता है। क्या अब भी आपको नहीं लगता कि हमें अपनी भूमिका पुनर्निर्धारित करनी पड़ेगी? आइए एक कदम आगे चलते हैं। गूगल लैब्स के क्रिएटिव टेक्नोलॉजिस्ट कवनदीप विरदी 'नीमन लैब्स' के लिए ल...
रॉयटर्स की ताज़ा रिपोर्ट, जो अब पुरानी (बासी) जान पड़ती है, मौसम का हाल तो बताती है लेकिन तूफ़ान से बाहर कैसे निकलना है, यह हम पर छोड़ देती है। बतौर पत्रकार हमें एक ऐसी पहेली सुलझानी है जिसका कोई सिरा फिलहाल हाथ आता नहीं दिखता। इस रिपोर्ट को निराशावादी अथवा आशावादी, किसी भी नज़रिए से पढ़ा जा सकता है; हालाँकि 'अवसरवादी' नज़रिया अपनाना बेहतर होगा। इसमें जिस 'बारबेल प्रभाव' (Barbell Effect) का ज़िक्र है, वह कुछ वैसा ही है जैसे कोई हमसे कहे कि नदी के दो किनारों में से एक को चुन लो और फिर उसी तरफ रहो। विडंबना यह है कि वर्तमान में आप नदी के बीचों-बीच हैं और आपके साथी पूछ रहे हैं कि किस तरफ चलना है। न्यूज़रूम में संचालन के साथ रणनीतिक भूमिकाएं निभाने वाले लोग निश्चित रूप से इस दुविधा से गुज़र रहे होंगे। नदी के एक किनारे पर मानवीय विशिष्टता पर केंद्रित पत्रकारिता है, तो दूसरे किनारे पर वह पत्रकारिता है जो कम लागत पर 'स्केल' और 'दक्षता' के लिए AI का इस्तेमाल करती है। पहली शैली ज़मीनी स्तर पर ओरिजिनल रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण, मानव-केंद्रित कहानियों और कम्युनिटी बिल्डि...